QWERTY कीबोर्ड क्यों है आज भी सबसे खास? क्रिस्टोफर शोल्स की वो क्रांतिकारी खोज जो 150 साल बाद भी नहीं हारी

QWERTY कीबोर्ड की शुरुआत 1870 के दशक में अमेरिकी आविष्कारक क्रिस्टोफर लैथम शोल्स ने की थी, जो शुरुआती टाइपराइटर की मैकेनिकल खराबी को दूर करने के लिए बनाया गया। आम अक्षर जोड़ियों को अलग रखकर जाम होने से बचाया गया, जिससे टाइपिंग तेज और विश्वसनीय हुई। रेमिंगटन कंपनी ने 1873 में इसे अपनाया और आज दुनिया भर में 95% से ज्यादा डिवाइसेज इसी लेआउट पर चलती हैं, जबकि विकल्प जैसे Dvorak और Colemak की अपनाने की दर 1% से भी कम है।

19वीं सदी के मध्य में अमेरिका के विस्कॉन्सिन राज्य में रहने वाले क्रिस्टोफर लैथम शोल्स एक प्रिंटर, न्यूजपेपर एडिटर और पॉलिटिशियन थे। 1860 के दशक में उन्होंने कार्लोस ग्लिडेन और सैमुअल डब्ल्यू. सौले के साथ मिलकर एक ऐसी मशीन बनाने की कोशिश की जो अक्षरों को छाप सके। शुरुआत में उनकी मशीन का कीबोर्ड पियानो जैसा था, जहां अक्षर ABC क्रम में लगे थे। यह व्यवस्था सरल लगती थी, लेकिन समस्या तब आई जब तेज टाइपिंग में मेटल टाइप बार एक-दूसरे से टकराकर जाम हो जाते थे।

शोल्स ने कई प्रयोग किए। उन्होंने अंग्रेजी भाषा में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली अक्षर जोड़ियों जैसे th, he, er, an आदि का अध्ययन किया। इन जोड़ियों को कीबोर्ड पर दूर-दूर रखा गया ताकि टाइप बार ज्यादा न टकराएं। 1870 तक उन्होंने चार रो वाली व्यवस्था विकसित की, जहां ऊपरी रो में Q W E R T Y अक्षर आए। इसी से नाम पड़ा QWERTY। शुरुआती प्रोटोटाइप में कुछ बदलाव हुए, जैसे R और . की पोजीशन, लेकिन अंतिम रूप 1873 में मिला।

1873 में शोल्स ने अपनी पेटेंट रेमिंगटन आर्म्स कंपनी को बेच दी। कंपनी ने इसे Remington Type Writer के नाम से बाजार में उतारा। यह पहला व्यावसायिक रूप से सफल टाइपराइटर था। QWERTY लेआउट ने टाइपिंग को तेज बनाया क्योंकि मैकेनिकल जाम कम हुआ। 1870-80 के दशक में टाइपराइटर का इस्तेमाल ऑफिस, कोर्ट और न्यूजपेपर में बढ़ा, जिससे QWERTY स्टैंडर्ड बन गया।

टाइपराइटर के दौर में QWERTY ने टाइपिस्टों की स्पीड बढ़ाई। जब कंप्यूटर आए, तो IBM PC ने 1981 में इसी लेआउट को अपनाया। आज स्मार्टफोन, लैपटॉप, टैबलेट, ATM, स्मार्ट टीवी और वर्चुअल कीबोर्ड तक में QWERTY ही प्रमुख है। दुनिया भर में 95% से ज्यादा कीबोर्ड इसी पर आधारित हैं। भारत में भी हिंदी टाइपिंग के लिए InScript या phonetic लेआउट QWERTY बेस पर ही काम करते हैं, जिससे यूजर्स आसानी से स्विच कर लेते हैं।

QWERTY की खासियतें क्या हैं?

मैकेनिकल बैलेंस — आम अक्षर जोड़ियों को अलग रखने से शुरुआती मशीनों में जाम कम हुआ।

होम रो फोकस — A S D F और J K L ; जैसी पोजीशन से उंगलियां कम चलती हैं।

नंबर और सिंबल की सुविधा — टॉप रो में नंबर आसानी से पहुंचते हैं।

ग्लोबल स्टैंडर्ड — हर देश में ट्रेनिंग और डिवाइस एक जैसे, जिससे बदलाव महंगा और मुश्किल।

विकल्प क्यों नहीं चल पाए?

Dvorak Simplified Keyboard (1936) और Colemak (2006) जैसे लेआउट दावा करते हैं कि वे उंगलियों की यात्रा 50-70% कम करते हैं और स्पीड बढ़ाते हैं। Dvorak में vowels होम रो पर ज्यादा होते हैं। लेकिन अपनाने की दर बहुत कम है। 2025-26 के ट्रेंड्स में भी इनकी मार्केट शेयर 1% से नीचे है। कारण — लाखों लोग पहले से QWERTY सीख चुके हैं। नई पीढ़ी को सिखाना, सॉफ्टवेयर अपडेट और डिवाइस चेंज की जरूरत पड़ती है।

QWERTY की मौजूदा स्थिति

2026 में मैकेनिकल कीबोर्ड मार्केट 2.66 बिलियन डॉलर का है, जिसमें ज्यादातर QWERTY ही बिकते हैं। भारत में गेमिंग, ऑफिस और मोबाइल यूजर्स QWERTY पर निर्भर हैं। वॉइस टाइपिंग और AI बढ़ रहे हैं, लेकिन फिजिकल और वर्चुअल इनपुट में QWERTY का दबदबा बरकरार है।

यह लेआउट अब सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि हमारी डिजिटल आदत का हिस्सा बन चुका है। क्रिस्टोफर शोल्स का 150 साल पुराना आविष्कार आज भी हर टच और क्लिक में जिंदा है।

Disclaimer: यह खबर सूचनात्मक उद्देश्य से तैयार की गई है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top