हरिद्वार की मायादेवी मंदिर में फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर देशभर से आए साधु-संतों ने पारंपरिक रूप से पंचगव्य से होली खेली। गाय के गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और मक्खन से बने पवित्र मिश्रण से रंगों की जगह आध्यात्मिक उत्सव मनाया गया, जिसमें सभी ने विश्व शांति और कल्याण की प्रार्थना की। यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण और गौ-माता के महत्व को भी रेखांकित करती है।
27 फरवरी 2026 को फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि पर हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी मां मायादेवी मंदिर में रंगभरी एकादशी (जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है) बड़े उत्साह और श्रद्धा से मनाई गई। इस दिन देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों साधु-संत, महात्मा और श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचे, जहां पारंपरिक रूप से रंगों की बजाय पंचगव्य से होली खेली गई।
मायादेवी मंदिर परिसर में सुबह से ही संतों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई। जूना अखाड़े, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और अन्य अखाड़ों के संतों ने मुख्य भूमिका निभाई। पंचगव्य—गाय के गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी (या मक्खन) से तैयार किया गया पवित्र मिश्रण—होली के रंग के रूप में इस्तेमाल किया गया। संतों ने एक-दूसरे पर यह मिश्रण डाला और हाथों में लेकर नाच-गाकर भक्ति भजनों का गायन किया।
यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, जब साधु-संत रंगों से दूर रहकर प्रकृति-आधारित पदार्थों से होली खेलते थे। पंचगव्य का उपयोग न केवल आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है, बल्कि यह गौ-संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है। गाय को पवित्र मानकर उसके उत्पादों से उत्सव मनाना भारतीय संस्कृति में गहराई से जुड़ा हुआ है।
कार्यक्रम के दौरान जूना अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरि गिरि महाराज ने कहा कि हरिद्वार ‘हरि’ और ‘हर’ अर्थात भगवान विष्णु और भगवान शिव की संयुक्त कृपा वाली नगरी है। यहां की उपासना सीधे ईश्वर तक पहुंचती है। उन्होंने सभी से विश्व कल्याण, शांति और पर्यावरण संरक्षण की कामना की।
इस अवसर पर स्वामी चक्रपाणि नंद गिरि का चादर अभिषेक विधि-विधान से किया गया। जगद्गुरु आश्रम के स्वामी राजराजेश्वराश्रम, मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्र पुरी और अन्य प्रमुख संतों ने भी भाग लिया। संतों ने सामूहिक भजन-कीर्तन किया और भगवान शिव-पार्वती तथा विष्णु-लक्ष्मी की आराधना की।
रंगभरी एकादशी को होली उत्सव की शुरुआत माना जाता है। काशी, अयोध्या और ब्रज में रंग-गुलाल से उत्सव शुरू होता है, लेकिन हरिद्वार में यह अनोखा रूप पंचगव्य से अपनाया जाता है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व रहा, जहां हजारों श्रद्धालुओं ने हर की पौड़ी पर डुबकी लगाई।
मुख्य बिंदु:
तिथि और महत्व : फाल्गुन शुक्ल एकादशी 27 फरवरी 2026 को मनाई गई, जो आमलकी एकादशी के नाम से भी जानी जाती है। आंवले के वृक्ष में विष्णु का वास माना जाता है।
पंचगव्य होली : गाय के पांच उत्पादों से बनी होली, जो रासायनिक रंगों से मुक्त और स्वास्थ्यवर्धक है।
संदेश : गौ-माता की रक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आध्यात्मिक शुद्धि पर जोर।
प्रार्थना : सभी संतों ने विश्व में शांति, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना की।
भंडारा : पर्व पर दो दिवसीय भंडारे का आयोजन, जहां सभी को प्रसाद वितरित किया गया।
यह उत्सव हरिद्वार की धार्मिक विरासत को मजबूत करता है और भक्तों को आगामी होली के लिए आध्यात्मिक तैयारी का अवसर देता है।



