डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर, मगर इन्हें हो सकता है फायदा; क्या है गणित?

“रुपये ने 91.99 के स्तर को छुआ, जो अब तक का सबसे निचला रिकॉर्ड है; विदेशी फंड आउटफ्लो, भू-राजनीतिक तनाव और आयातकों की डॉलर मांग से दबाव बढ़ा; निर्यातक सेक्टर जैसे आईटी, फार्मा और केमिकल्स को फायदा, जबकि आयात-निर्भर क्षेत्र प्रभावित; महंगाई बढ़ सकती है, रेमिटेंस बढ़ेगा; गणित में निर्यातकों की कमाई 6-7% बढ़ सकती है।”

रुपये की गिरावट ने 23 जनवरी 2026 को 91.99 के स्तर को पार कर लिया, जो भारतीय मुद्रा के इतिहास में सबसे निचला बिंदु है। पिछले一个月 में रुपया 2.07% कमजोर हुआ, जबकि साल की शुरुआत से अब तक कुल गिरावट 3.5% से ज्यादा पहुंच गई। विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार से 15 अरब डॉलर से अधिक निकाले, जो रुपये पर सीधा दबाव डाल रहा है। भू-राजनीतिक तनाव, जैसे मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष और वैश्विक व्यापार युद्ध, ने डॉलर को मजबूत बनाया, जिससे रुपया प्रभावित हुआ। आयातकों की ओर से डॉलर की मांग बढ़ी, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास मंडरा रही हैं, जो भारत के 80% से ज्यादा तेल आयात को महंगा कर रही हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने बाजार में हस्तक्षेप कर 5 अरब डॉलर बेचे, लेकिन यह गिरावट को पूरी तरह रोक नहीं सका।

इस गिरावट के पीछे व्यापार घाटा भी बड़ा कारक है, जहां भारत का निर्यात 2025 के मुकाबले 4% बढ़ा, लेकिन आयात 7% से ज्यादा उछला। अमेरिकी ट्रेजरी की रिपोर्ट के अनुसार, डॉलर इंडेक्स 105 के स्तर पर पहुंच गया, जो रुपये जैसी उभरती मुद्राओं को कमजोर कर रहा है। घरेलू स्तर पर, मुद्रास्फीति 5.5% के आसपास बनी हुई है, जो रुपये की स्थिरता को चुनौती दे रही है। अगर यह गिरावट जारी रही, तो 2026 के अंत तक रुपया 93-94 के स्तर तक जा सकता है, जैसा कि कुछ आर्थिक विश्लेषकों का अनुमान है।

रुपये की कमजोरी से अर्थव्यवस्था पर दोतरफा असर पड़ रहा है। एक ओर, आयात महंगे हो रहे हैं, जिससे उपभोक्ता सामान जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो पार्ट्स की कीमतें 5-10% बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर, निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी लाभ मिल रहा है, क्योंकि उनके उत्पाद विदेशी बाजारों में सस्ते हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर कोई निर्यातक 100 डॉलर का माल बेचता है, तो पहले 85 रुपये में मिलने वाली रकम अब 92 रुपये हो गई, यानी 8% का सीधा लाभ। लेकिन अगर उनका कच्चा माल आयातित है, तो लागत भी बढ़ती है, जिससे नेट गेन 3-5% रह जाता है।

रुपये की गिरावट के प्रमुख कारण

विदेशी फंड आउटफ्लो : 2026 की शुरुआत से FPI ने 12 अरब डॉलर निकाले, जो उभरते बाजारों से कैपिटल फ्लो के कारण हुआ।

डॉलर की मजबूती : अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 3% की ग्रोथ और फेड रेट्स 4.5% पर बने रहने से डॉलर इंडेक्स ऊपर चढ़ा।

व्यापार असंतुलन : भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट GDP के 2.5% तक पहुंचा, जो रुपये को दबा रहा है।

कमोडिटी कीमतें : गोल्ड और ऑयल आयात की लागत बढ़ी, जिससे डॉलर डिमांड 20% उछली।

घरेलू फैक्टर : कमजोर कॉरपोरेट अर्निंग्स और हाई वैल्यूएशंस ने निवेशकों को दूर किया।

कौन से सेक्टर को फायदा हो रहा है?

रुपये की गिरावट निर्यात-उन्मुख सेक्टरों के लिए वरदान साबित हो रही है, क्योंकि उनकी कमाई रुपये में बढ़ जाती है। यहां कुछ प्रमुख सेक्टर और उनका गणित:

सेक्टरफायदा का प्रकारअनुमानित लाभ (%)उदाहरण कंपनियां
आईटी सर्विसेजविदेशी कमाई डॉलर में, रुपये में कन्वर्जन से गेन6-8%TCS, Infosys, Wipro
फार्मास्यूटिकल्सजेनेरिक दवाओं का निर्यात बढ़ा, मार्जिन सुधरा5-7%Sun Pharma, Dr. Reddy’s
स्पेशल्टी केमिकल्सयूरोप और अमेरिका को निर्यात, प्रतिस्पर्धी कीमतें4-6%PI Industries, SRF
टेक्सटाइल्सकम आयात निर्भरता, लेकिन यूएस टैरिफ से चुनौती3-5%Arvind, Raymond
ज्वेलरीगोल्ड आयात महंगा, लेकिन निर्यात में उछाल2-4%Titan, PC Jeweller

इन सेक्टरों में, आईटी कंपनियां सबसे ज्यादा लाभान्वित हैं, क्योंकि उनकी 70% कमाई डॉलर में आती है। अगर रुपया 1% कमजोर होता है, तो उनका EBITDA मार्जिन 0.5% बढ़ जाता है। फार्मा सेक्टर में, अमेरिकी बाजार से 40% रेवेन्यू आने से, 2026 में निर्यात वॉल्यूम 10% बढ़ सकता है। हालांकि, अगर आयातित कच्चा माल 30% से ज्यादा है, तो नेट फायदा घट जाता है – जैसे केमिकल्स में जहां इनपुट कॉस्ट 4% बढ़ी।

आम आदमी पर असर का गणित

रुपये की गिरावट से महंगाई का खतरा बढ़ा, क्योंकि आयातित सामान महंगे हो रहे हैं। पेट्रोल की कीमत 105 रुपये प्रति लीटर पहुंच सकती है, अगर रुपया 92 पर स्थिर रहा। विदेश यात्रा के लिए, एक अमेरिकी ट्रिप का खर्च 20% बढ़ गया – पहले 5 लाख रुपये में होने वाला अब 6 लाख। ओवरसीज एजुकेशन में, यूएस यूनिवर्सिटी की फीस 50,000 डॉलर की अब 46 लाख रुपये में पड़ेगी, पहले 42.5 लाख से। लेकिन NRI रेमिटेंस बढ़ा, जहां 1,000 डॉलर अब 91,990 रुपये बनते हैं, पहले 85,000 से। अगर परिवार को 10,000 डॉलर भेजे जाते हैं, तो अतिरिक्त 70,000 रुपये मिलते हैं।

स्टॉक मार्केट में, सेंसेक्स 2% गिरा, लेकिन निर्यातक शेयरों जैसे TCS में 3% उछाल आया। बॉन्ड यील्ड्स 7.2% पर पहुंचीं, जो लोन रेट्स को प्रभावित कर रही हैं। अगर रुपया 93 तक गिरा, तो GDP ग्रोथ 0.2% घट सकती है, लेकिन निर्यात से 0.5% का ऑफसेट हो सकता है।

आगे की चुनौतियां और रणनीतियां

आरबीआई के पास 650 अरब डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व है, जो 12 महीने के आयात को कवर करता है, लेकिन लगातार हस्तक्षेप से यह घट रहा है। सरकार व्यापार समझौतों पर फोकस कर रही है, जैसे यूएस के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, जो टैरिफ से बचाएगा। निवेशकों के लिए, डॉलर-लिंक्ड फंड्स या गोल्ड में निवेश फायदेमंद हो सकता है, जहां गोल्ड की कीमतें 75,000 रुपये प्रति 10 ग्राम पहुंच गईं। निर्यातकों को हेजिंग स्ट्रैटजी अपनानी चाहिए, जैसे फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स, जहां 3 महीने के लिए डॉलर को 92 पर लॉक किया जा सकता है। अगर वैश्विक तनाव कम हुए, तो रुपया 90 तक रिकवर कर सकता है, लेकिन ट्रेड वॉर से 95 का खतरा है।

Disclaimer: यह रिपोर्ट सामान्य जानकारी के लिए है और निवेश सलाह नहीं मानी जाएगी। बाजार की स्थितियां बदल सकती हैं, इसलिए पेशेवर सलाह लें।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top