“आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में एमएसएमई क्षेत्र को भारत की आर्थिक वृद्धि का मुख्य आधार बताया गया है, जो जीडीपी में 30% योगदान देता है और 11 करोड़ से अधिक रोजगार प्रदान करता है। हालांकि, 8.1 लाख करोड़ रुपये की भुगतान देरी और औपचारिक कर्ज तक सीमित पहुंच प्रमुख बाधाएं हैं, जिसके लिए कैश-फ्लो आधारित ऋण विस्तार और डिजिटल समाधानों की सिफारिश की गई है। सर्वेक्षण में एमएसएमई क्रेडिट में 21.8% की वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन माइक्रो उद्यमों में संपार्श्विक की कमी चुनौती बनी हुई है।”
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, एमएसएमई क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जहां यह विनिर्माण क्षेत्र की गति को बढ़ावा देने के लिए तैयार है। सर्वेक्षण में बताया गया कि एमएसएमई 6.4 करोड़ इकाइयों से अधिक हैं, जो देश के कुल निर्यात में 45% हिस्सा रखती हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन का प्रमुख स्रोत हैं। हाल के वर्षों में, एमएसएमई क्रेडिट में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जहां 2025 में शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंकों द्वारा दिए गए क्रेडिट में 21.8% की सालाना वृद्धि दर्ज की गई, जो 2024 के 13% से अधिक है।
इस वृद्धि के बावजूद, माइक्रो उद्यमों के लिए औपचारिक कर्ज प्राप्त करना एक बाधा बना हुआ है, क्योंकि संपार्श्विक की कमी और दस्तावेजीकरण की अपर्याप्तता के कारण कई इकाइयां बैंकिंग सिस्टम से बाहर रहती हैं। सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया कि कैश-फ्लो आधारित ऋण मॉडल को विस्तारित किया जाए, जो पहली बार उधारकर्ताओं और माइक्रो एंटरप्राइजेज को क्रेडिट उपलब्ध कराने में मदद करेगा। इसके अलावा, डिजिटल इंटीग्रेशन को बढ़ावा देने से क्रेडिट फुटप्रिंट का विस्तार हो सकता है, जहां Udyam पोर्टल पर पंजीकृत एमएसएमई की संख्या 2025 में 4 करोड़ से अधिक पहुंच गई।
भुगतान में देरी एमएसएमई के लिए सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है, जहां अनुमानित 8.1 लाख करोड़ रुपये की राशि देरी से भुगतान में फंसी हुई है। यह स्थिति कार्यशील पूंजी को प्रभावित करती है और विकास को बाधित करती है, खासकर माइक्रो सप्लायर्स के लिए जो बड़े खरीदारों पर निर्भर हैं। सर्वेक्षण में उल्लेख किया गया कि एमएसएमई अक्सर कानूनी मार्ग अपनाने से हिचकते हैं, क्योंकि इससे व्यावसायिक संबंध खराब होने का डर रहता है। इसके समाधान के लिए, ऑनलाइन डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन सिस्टम को मजबूत करने की सिफारिश की गई है, जो एमएसएमई समाधान पोर्टल के माध्यम से विवादों का तेजी से निपटारा करेगा।
एमएसएमई क्षेत्र की चुनौतियों को समझने के लिए, सर्वेक्षण में विभिन्न सेक्टरों का विश्लेषण किया गया। उदाहरण के लिए, विनिर्माण सेक्टर में कच्चे माल की उपलब्धता एक मुद्दा है, जबकि सेवा और ट्रेडिंग सेक्टर में तकनीकी अपग्रेडेशन और भुगतान देरी प्रमुख हैं। प्राथमिक सर्वेक्षण से पता चला कि 22% एमएसएमई क्रेडिट पहुंच को अपनी शीर्ष चुनौती मानते हैं, जबकि 18% उच्च प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हैं। महिलाओं द्वारा संचालित एमएसएमई में यह चुनौतियां और गंभीर हैं, जहां क्रेडिट गैप जेंडर आधारित है और केवल 20.5% महिलाओं की इकाइयां Udyam Assist पर पंजीकृत हैं।
सर्वेक्षण में एमएसएमई के योगदान को रेखांकित करते हुए बताया गया कि यह क्षेत्र देश के जीवीए का 4.6% से अधिक हिस्सा रखता है, लेकिन भुगतान देरी के कारण कार्यशील पूंजी की कमी से ग्रोथ प्रभावित होती है। सरकारी हस्तक्षेप जैसे TReDS प्लेटफॉर्म का विस्तार और इनकम टैक्स एक्ट की सेक्शन 43B(h) ने भुगतान समयसीमा को 45 दिनों तक सीमित करने में मदद की है, जिससे 2024 में देरी से भुगतान की राशि 10.7 लाख करोड़ से घटकर 7.34 लाख करोड़ हो गई। हालांकि, 2025-26 में यह फिर से 8.1 लाख करोड़ तक पहुंच गई, जो सिस्टमिक गैप्स को दर्शाती है।
एमएसएमई क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियां और आंकड़े
| चुनौती | प्रतिशत प्रभावित एमएसएमई | प्रभाव |
|---|---|---|
| क्रेडिट पहुंच | 22% | संपार्श्विक की कमी से माइक्रो इकाइयां बाहर, क्रेडिट गैप 20-25 लाख करोड़ रुपये |
| भुगतान देरी | 18% | 8.1 लाख करोड़ रुपये फंसे, कार्यशील पूंजी प्रभावित |
| उच्च प्रतिस्पर्धा | 15% | बड़े खिलाड़ियों से दबाव, बाजार पहुंच सीमित |
| तकनीकी अपग्रेडेशन | 10% | डिजिटल इंटीग्रेशन की कमी से निर्यात प्रभावित |
| नियामक अनुपालन | 8% | जटिल कानूनों से छोटी इकाइयां प्रभावित |
सर्वेक्षण में क्षेत्रवार विश्लेषण से पता चला कि विनिर्माण एमएसएमई में कच्चे माल की उपलब्धता 8% इकाइयों की प्रमुख समस्या है, जबकि सेवा सेक्टर में भुगतान देरी 15% को प्रभावित करती है। ट्रेडिंग सेक्टर में उच्च प्रतिस्पर्धा 15% एमएसएमई की चुनौती है। क्षेत्रीय स्तर पर, महाराष्ट्र में महिलाओं द्वारा संचालित एमएसएमई की संख्या 25 लाख से अधिक है, लेकिन क्रेडिट पहुंच में क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं।
सरकार की योजनाओं का प्रभाव देखते हुए, ECLGS का विस्तार 2025 में एमएसएमई क्रेडिट को 30.6% बढ़ाने में सहायक रहा, लेकिन मध्यम इकाइयों में देरी से वितरण एक मुद्दा है। सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया कि फिनटेक साझेदारियों को बढ़ावा दिया जाए, जहां Polygon और Coingecko जैसे प्लेटफॉर्म डिजिटल क्रेडिट मूल्यांकन में मदद कर सकते हैं। इसके अलावा, MSME-1 रिपोर्टिंग को संशोधित करने से पारदर्शिता बढ़ेगी, जो देरी से भुगतान को ट्रैक करने में उपयोगी है।
एमएसएमई के विकास के लिए, सर्वेक्षण में निर्यात संवर्धन पर जोर दिया गया, जहां हैंडीक्राफ्ट और टॉय सेक्टर में जीएसटी दरों को 5% तक घटाने से लाभ होगा। ऑटोमोटिव सेक्टर में छोटी कारों और टू-व्हीलर्स पर जीएसटी कटौती से मांग बढ़ेगी, जो एमएसएमई सप्लायर्स को मजबूत करेगी। कुल मिलाकर, एमएसएमई क्षेत्र की औसत ग्रोथ रेट 2025 में 14.5% रही, लेकिन कर्ज और भुगतान मुद्दों को हल करने से यह 20% तक पहुंच सकती है।
एमएसएमई क्रेडिट वृद्धि का तुलनात्मक विश्लेषण
| वर्ष | कुल बैंक क्रेडिट वृद्धि (%) | एमएसएमई क्रेडिट वृद्धि (%) | प्रमुख कारण |
|---|---|---|---|
| 2024 | 11.2 | 13.0 | सरकारी हस्तक्षेप, ECLGS |
| 2025 | 14.5 | 21.8 | डिजिटल इंटीग्रेशन, TReDS विस्तार |
| 2026 (अनुमानित) | 16.0 | 25.0 | कैश-फ्लो लेंडिंग, ओडीआर सिस्टम |
सर्वेक्षण में एमएसएमई की फाइनेंशियल सस्टेनेबिलिटी पर जोर देते हुए बताया गया कि फ्लोटिंग-रेट डेट केवल 4.1% है, जो ब्याज दर जोखिम को कम करता है। राज्य स्तर पर डेट-जीएसडीपी अनुपात 28.1% है, लेकिन एमएसएमई क्रेडिट में राज्यवार भिन्नताएं हैं, जहां दक्षिणी राज्य जैसे तमिलनाडु में महिलाओं की इकाइयां अधिक सक्रिय हैं।
एमएसएमई के लिए साइबर सिक्योरिटी एक उभरती चुनौती है, जहां 7% इकाइयां डेटा सुरक्षा से प्रभावित हैं। सर्वेक्षण में सिफारिश की गई कि 7 साइबर सिक्योरिटी टिप्स अपनाए जाएं, जैसे मजबूत पासवर्ड, रेगुलर अपडेट्स और फिशिंग ट्रेनिंग। इसके अलावा, सस्टेनेबल प्रैक्टिसेज को अपनाने से एमएसएमई निर्यात में 10% वृद्धि कर सकती हैं, जहां जीएसटी सुधारों से ट्रांजेक्शन कॉस्ट घटेगी।
अंत में, सर्वेक्षण एमएसएमई को भारत की 5जी और स्टार्टअप इकोसिस्टम से जोड़ने पर फोकस करता है, जहां यूपीआई जैसे टूल्स से भुगतान प्रक्रिया तेज होगी।
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