“नई कार खरीदने के बाद यदि शोरूम से बाहर निकलते ही एक्सीडेंट हो जाए, तो जिम्मेदारी तय करने के लिए कानूनी नियम, इंश्योरेंस पॉलिसी और डिलीवरी प्रक्रिया महत्वपूर्ण हैं। आमतौर पर ओनरशिप ट्रांसफर के बाद मालिक और इंश्योरेंस कंपनी जिम्मेदार होते हैं, लेकिन डिफेक्ट केस में डीलर शामिल हो सकता है। IRDAI गाइडलाइंस के तहत क्लेम प्रोसेस तेजी से पूरा होता है, जिसमें 30 दिनों के अंदर सेटलमेंट जरूरी है।”
भारत में नई कार खरीदते समय डीलर आमतौर पर थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस प्रदान करता है, जो रजिस्ट्रेशन के साथ वैलिड हो जाता है। यदि शोरूम से बाहर निकलते ही एक्सीडेंट होता है, तो ओनरशिप ट्रांसफर पूरा होने पर मालिक को इंश्योरेंस क्लेम के जरिए मरम्मत करानी पड़ती है। मोटर व्हीकल एक्ट 1988 के सेक्शन 140 के तहत नो-फॉल्ट लायबिलिटी लागू होती है, जहां पीड़ित को बिना गलती साबित किए कंपेंसेशन मिल सकता है।
हाल के ट्रेंड्स से पता चलता है कि 2025 में दिल्ली में एक थार SUV शोरूम से बाहर निकलते ही क्रैश हो गई, जहां इंश्योरेंस कंपनी ने कैशलेस क्लेम के जरिए वर्कशॉप से सीधे सेटलमेंट किया। IRDAI के नए नियमों के अनुसार, 2026 से क्लेम सेटलमेंट 10-30 दिनों में अनिवार्य है, जिससे मालिक को तुरंत राहत मिलती है।
जिम्मेदारी तय करने के प्रमुख फैक्टर:
ओनरशिप ट्रांसफर: यदि डिलीवरी पूरी हो चुकी है और RC मालिक के नाम पर है, तो मरम्मत का प्राथमिक बोझ इंश्योरेंस पर पड़ता है। डीलर केवल यदि व्हीकल डिफेक्टिव साबित होता है, जैसे ब्रेक फेलियर, तो जिम्मेदार होता है।
इंश्योरेंस कवरेज: नई कारों में कंप्रीहेंसिव पॉलिसी में ओन डैमेज कवर शामिल होता है, जो एक्सीडेंट केस में 80-100% मरम्मत कवर करती है, डिडक्टिबल अमाउंट को छोड़कर। थर्ड-पार्टी कवर केवल दूसरे पक्ष के डैमेज को कवर करता है।
डीलर की भूमिका: यदि एक्सीडेंट डीलर के कंट्रोल में होता है, जैसे टेस्ट ड्राइव के दौरान, तो सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के अनुसार डीलर या मैन्युफैक्चरर जिम्मेदार होता है। लेकिन शोरूम से बाहर निकलने के बाद यह शिफ्ट हो जाता है।
क्लेम प्रोसेस की स्टेप-बाय-स्टेप गाइड:
एक्सीडेंट के तुरंत बाद सेफ्टी सुनिश्चित करें और पुलिस को रिपोर्ट करें, FIR दर्ज कराएं।
इंश्योरेंस कंपनी को 24 घंटे के अंदर इंफॉर्म करें, फोटो और डिटेल्स शेयर करें।
अधिकृत वर्कशॉप में कार ले जाएं, जहां कैशलेस क्लेम के तहत कंपनी डायरेक्ट पेमेंट करती है।
यदि माइनर डैमेज है, तो रीइंबर्समेंट क्लेम के लिए बिल सबमिट करें।
संभावित खर्च और बचाव के तरीके:
| स्थिति | जिम्मेदार पक्ष | अनुमानित खर्च (रुपये में) | टिप्स |
|---|---|---|---|
| ओनरशिप ट्रांसफर के बाद | इंश्योरेंस कंपनी | 50,000-2,00,000 (डैमेज पर निर्भर) | कंप्रीहेंसिव पॉलिसी चुनें, जिसमें जीरो डेप्रिशिएशन ऐड-ऑन हो। |
| व्हीकल डिफेक्ट के कारण | डीलर/मैन्युफैक्चरर | पूरा खर्च | वारंटी क्लॉज चेक करें, कंज्यूमर कोर्ट में अपील करें। |
| मालिक की गलती | मालिक + इंश्योरेंस | डिडक्टिबल 2,000-5,000 | NCB (नो क्लेम बोनस) बचाने के लिए छोटे क्लेम खुद हैंडल करें। |
| थर्ड-पार्टी डैमेज | इंश्योरेंस | असीमित लायबिलिटी | हमेशा पुलिस रिपोर्ट रखें। |
2026 के ट्रेंड्स में EV कारों के लिए स्पेशल इंश्योरेंस पॉलिसी आ रही हैं, जहां बैटरी डैमेज पर 100% कवर मिलेगा। यदि एक्सीडेंट में कोई इंजरी होती है, तो पर्सनल एक्सीडेंट कवर से 15 लाख तक का कंपेंसेशन क्लेम किया जा सकता है।
कंज्यूमर फोरम के हालिया केसों में देखा गया कि यदि डीलर ने इंश्योरेंस डिटेल्स नहीं शेयर किए, तो वे पेनल्टी के हकदार हो सकते हैं। इसलिए, डिलीवरी के समय सभी डॉक्युमेंट्स चेक करें।
Disclaimer: यह रिपोर्ट सामान्य जानकारी, कानूनी प्रावधानों और हालिया ट्रेंड्स पर आधारित है। व्यक्तिगत मामलों में विशेषज्ञ सलाह लें।