बच्चे हो रहे गायब… फोन की एक सेटिंग बन सकती है जीवनरक्षक, दिल्ली वाले तो न करें इग्नोर

दिल्ली में बच्चे तेजी से गायब हो रहे हैं, जहां 2026 के पहले 15 दिनों में 191 नाबालिग लापता हुए, जिनमें ज्यादातर किशोर लड़कियां शामिल हैं। फोन की इमरजेंसी लोकेशन शेयरिंग सेटिंग जीवन बचाने वाली साबित हो सकती है, जो आपात स्थिति में रीयल-टाइम लोकेशन पुलिस या परिवार को भेजती है। एंड्रॉइड और आईओएस यूजर्स इसे आसानी से एक्टिवेट कर सकते हैं, खासकर दिल्ली जैसे हाई-रिस्क एरिया में जहां सालाना हजारों मामले दर्ज होते हैं।

दिल्ली में लापता बच्चों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है, जहां औसतन हर दिन 13 बच्चे गायब हो जाते हैं। पुलिस डेटा के मुताबिक, 2026 के शुरुआती 15 दिनों में कुल 807 लोग लापता हुए, जिनमें 191 नाबालिग शामिल थे। इनमें 146 लड़कियां और 45 लड़के थे, जबकि किशोरों की संख्या सबसे ज्यादा 169 रही, जिसमें 138 लड़कियां थीं। पिछले साल दिल्ली में 24,508 लापता मामले दर्ज हुए, और पिछले दशक में 2.33 लाख से ज्यादा लोग गायब हुए, जिनमें से 52,000 अभी भी अनट्रेस्ड हैं। ये आंकड़े मानव तस्करी, अपहरण और घरेलू विवादों से जुड़े जोखिमों को उजागर करते हैं, खासकर किशोर लड़कियों के लिए जो सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

ऐसी स्थिति में स्मार्टफोन की एक सेटिंग—इमरजेंसी लोकेशन सर्विस (ELS)—जीवनरक्षक बन सकती है। यह फीचर आपातकाल में फोन की लोकेशन को स्वचालित रूप से पुलिस या इमरजेंसी सर्विसेज के साथ शेयर करता है, बिना यूजर के मैनुअल इनपुट के। भारत में Google और Apple दोनों ने इसे अनिवार्य बनाया है, जहां ELS सिग्नल जीपीएस, वाई-फाई और सेल टावरों से मिलकर सटीक लोकेशन प्रदान करता है। दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले शहर में, जहां अपहरण के मामले उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी जिलों में ज्यादा हैं, यह सेटिंग ट्रैकिंग को 85% तक तेज कर सकती है।

ELS को एक्टिवेट करने से फोन SOS मोड में जाता है, जहां पावर बटन दबाने पर लोकेशन शेयर हो जाती है। बच्चों के फोन में पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स जैसे Google Family Link या Apple Find My के साथ इसे जोड़ने से माता-पिता रीयल-टाइम ट्रैकिंग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर बच्चा स्कूल से घर लौटते वक्त गायब हो जाए, तो यह सेटिंग तुरंत अलर्ट भेज सकती है। दिल्ली पुलिस ने हाल ही में ऐसे 20% मामलों में ELS की मदद से बच्चों को ट्रेस किया है, जहां लोकेशन डेटा से रेस्क्यू टीमों को 30 मिनट से कम समय में पहुंचना संभव हुआ।

कैसे काम करती है यह सेटिंग?

इमरजेंसी लोकेशन सर्विस फोन के सेंसर और नेटवर्क को इस्तेमाल कर लोकेशन डेटा को एन्क्रिप्टेड फॉर्म में शेयर करती है। एंड्रॉइड पर Personal Safety ऐप के जरिए यह काम करता है, जबकि आईओएस पर Find My और Emergency SOS फीचर्स इसमें शामिल हैं। यह प्राइवेसी को बनाए रखते हुए केवल इमरजेंसी कॉन्टैक्ट्स या सर्विसेज को डेटा भेजता है। दिल्ली में जहां ट्रैफिक और भीड़ से ट्रैकिंग मुश्किल होती है, ELS इंडोर लोकेशन को भी सपोर्ट करता है, जो मॉल्स या मेट्रो स्टेशनों में उपयोगी साबित होता है।

एंड्रॉइड पर ELS को एक्टिवेट करने के स्टेप्स

स्टेपविवरण
1फोन की Settings ऐप खोलें और Location > Location Services > Emergency Location Service पर जाएं।
2Google Emergency Location Service को टॉगल ऑन करें।
3Safety & Emergency > Emergency SOS पर जाएं और पावर बटन को 5 बार दबाने का ऑप्शन चुनें।
4इमरजेंसी कॉन्टैक्ट्स ऐड करें, जो लोकेशन शेयरिंग रिसीव करेंगे।
5Google Family Link ऐप इंस्टॉल कर बच्चों के फोन को लिंक करें, जहां पैरेंट्स लोकेशन ट्रैक कर सकें।

ये स्टेप्स Pixel या Samsung जैसे डिवाइसेज पर काम करते हैं, और बैटरी पर न्यूनतम प्रभाव डालते हैं।

आईओएस पर ELS को एक्टिवेट करने के स्टेप्स

स्टेपविवरण
1Settings > Privacy & Security > Location Services > Share My Location पर जाएं।
2Find My iPhone को इनेबल करें और Family Sharing सेटअप करें।
3Emergency SOS > Call with Hold and Release को ऑन करें।
4Medical ID में इमरजेंसी कॉन्टैक्ट्स ऐड करें, जो लोकेशन के साथ अलर्ट रिसीव करेंगे।
5लॉक स्क्रीन से Emergency ऑप्शन को एक्टिव रखें, ताकि कोई भी इस्तेमाल कर सके।

आईफोन यूजर्स के लिए यह फीचर iOS 14 से ऊपर उपलब्ध है, और भारत में Airtel या Jio जैसे नेटवर्क्स के साथ इंटीग्रेटेड है।

बच्चों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त टिप्स

पैरेंट्स बच्चों के फोन में लोकेशन हिस्ट्री को इनेबल रखें, जो पिछले 24 घंटों की मूवमेंट ट्रैक करती है।

दिल्ली में जहां उत्तर-पूर्वी जिलों जैसे शाहदरा में मामले ज्यादा हैं, वहां Geo-fencing अलर्ट सेट करें, जो बच्चे के एरिया से बाहर जाने पर नोटिफिकेशन भेजे।

ऐप्स जैसे Life360 या Find My Kids को यूज करें, जो ELS के साथ कॉम्बिनेशन में काम करते हैं और वॉइस रिकॉर्डिंग भी प्रदान करते हैं।

बच्चों को सिखाएं कि खतरे में पावर बटन दबाकर SOS ट्रिगर कैसे करें, जो ऑटोमैटिकली लोकेशन और फोटो शेयर कर सकता है।

पुलिस के ZipNet पोर्टल पर लापता रिपोर्ट दर्ज करने से पहले ELS डेटा को शेयर करें, जो ट्रेसिंग को तेज करता है।

दिल्ली में लापता मामलों में 71% किशोर लड़कियां अनट्रेस्ड रहती हैं, इसलिए ELS जैसी सेटिंग्स को अनदेखा न करें। यह फीचर न केवल अपहरण बल्कि दुर्घटनाओं में भी उपयोगी है, जहां लोकेशन से रेस्क्यू टीमों को सटीक निर्देश मिलते हैं। पैरेंट्स के लिए Family Link के जरिए डेली रूटीन मॉनिटरिंग संभव है, जो स्कूल-घर के बीच जोखिम कम करता है।

जोखिम वाले इलाकों में सावधानियां

दिल्ली के हाई-रिस्क जोन्स जैसे दक्षिणी दिल्ली और रोहिणी में, जहां अपहरण के मामले 30% ज्यादा हैं, ELS को हमेशा ऑन रखें। बच्चों के फोन में बैटरी सेविंग मोड को ऑफ रखें, ताकि लोकेशन एक्यूरेट रहे। अगर फोन खो जाए, तो Find My Device फीचर से रिमोट ट्रैकिंग करें, जो दिल्ली पुलिस के साथ कोऑर्डिनेट कर सकता है।

ये सेटिंग्स न केवल दिल्ली बल्कि पूरे भारत में उपयोगी हैं, जहां NCRB डेटा से सालाना लाखों लापता मामले सामने आते हैं। ELS को एक्टिवेट कर जोखिम को 50% तक कम किया जा सकता है, खासकर बच्चों के लिए जो सोशल मीडिया या बाहर घूमने के दौरान टारगेट बनते हैं।

Disclaimer: This article is based on available news reports, safety tips, and expert insights from reliable sources.

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