“केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने WLTP साइकिल को अपनाने की अधिसूचना जारी कर दी है। अप्रैल 2027 से नई पैसेंजर कारों, SUVs और हल्के कमर्शियल वाहनों के लिए उत्सर्जन टेस्टिंग WLTP पर आधारित होगी, जो वास्तविक ड्राइविंग कंडीशंस को बेहतर तरीके से दर्शाती है। इससे ARAI द्वारा बताई गई माइलेज में 10-25% तक कमी आ सकती है, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण मजबूत होगा और ग्लोबल स्टैंडर्ड्स से भारत जुड़ेगा।”
WLTP साइकिल अपनाने से वाहनों पर क्या असर पड़ेगा
भारत ने वाहनों के उत्सर्जन और फ्यूल एफिशिएंसी टेस्टिंग में बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने सेंट्रल मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 में संशोधन कर Worldwide Harmonised Light Vehicles Test Procedure (WLTP) को अपनाने की अधिसूचना जारी की है। यह बदलाव 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होगा।
यह नियम मुख्य रूप से M1 और M2 कैटेगरी के वाहनों पर लागू होगा। M1 में पैसेंजर कारें, SUVs और MPVs शामिल हैं, जबकि M2 में 3,500 किलोग्राम तक के ग्रॉस व्हीकल वेट वाले कमर्शियल पैसेंजर वाहन जैसे वैन और छोटे बस आते हैं। इन सभी नए मॉडल्स के लिए BS-VI उत्सर्जन मानक अब WLTP साइकिल पर आधारित होंगे।
WLTP यूरोप में 2018 से लागू है और यह Modified Indian Driving Cycle (MIDC) से काफी अलग है। MIDC पुरानी NEDC पर आधारित है, जिसमें फिक्स्ड स्पीड पैटर्न, कम एक्सीलरेशन और ज्यादा स्टॉप-स्टार्ट होते हैं। WLTP में ज्यादा रियल-वर्ल्ड ड्राइविंग शामिल है – उच्च स्पीड, तेज एक्सीलरेशन, ज्यादा डिस्टेंस और विभिन्न टेम्परेचर कंडीशंस। टेस्ट साइकिल चार फेज में बंटी है: लो, मीडियम, हाई और एक्स्ट्रा-हाई स्पीड। कुल टेस्ट डिस्टेंस 23.25 किमी होता है, जबकि MIDC में केवल 11 किमी।
इस बदलाव से कार निर्माताओं को कई चुनौतियां मिलेंगी। WLTP में इंजन ज्यादा स्ट्रेस में टेस्ट होता है, इसलिए उत्सर्जन आंकड़े ज्यादा रियलिस्टिक होंगे। NOx, PM, CO और HC जैसे पॉल्यूटेंट्स पर सख्त लिमिट लागू होंगी। कई विशेषज्ञों के अनुसार, वही कार जो MIDC पर 20-25 किमी/लीटर माइलेज दिखाती है, WLTP पर 15-20% कम माइलेज दे सकती है। उदाहरण के लिए, छोटी पेट्रोल कारों में 18-22% तक गिरावट संभावित है, जबकि डीजल और हाई-स्पीड मॉडल्स में 10-15%।
कार कंपनियों को इंजन ट्यूनिंग, एग्जॉस्ट आफ्टर-ट्रीटमेंट सिस्टम जैसे SCR, DPF और बेहतर कैटेलिटिक कन्वर्टर में निवेश बढ़ाना पड़ेगा। OBD सिस्टम को और मजबूत करना होगा ताकि रियल-टाइम उत्सर्जन मॉनिटरिंग हो सके। AIS-175 प्रोसीजर के तहत टाइप अप्रूवल, प्रोडक्शन कॉन्फॉर्मिटी और OBD चेक अनिवार्य होंगे।
उपभोक्ताओं के लिए यह बदलाव दोतरफा है। एक ओर ARAI या अन्य एजेंसियों द्वारा बताई गई ARAI माइलेज अब ज्यादा सच्ची होगी, क्योंकि WLTP रियल-वर्ल्ड यूज से करीब है। शहर की ट्रैफिक, हाईवे स्पीड और एयरकंडीशनिंग के असर से माइलेज क्लोजर मैच करेगी। दूसरी ओर, अगर आपकी कार की ARAI फिगर 20 किमी/लीटर है, तो WLTP पर यह 16-17 किमी/लीटर तक आ सकती है, जिससे फ्यूल कॉस्ट बढ़ेगा।
यह कदम भारत को ग्लोबल ऑटोमोटिव स्टैंडर्ड्स से जोड़ेगा। यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश WLTP इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे भारतीय कारें अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगी, खासकर एक्सपोर्ट के लिए। साथ ही, BS-VI के साथ WLTP अपनाने से वायु प्रदूषण नियंत्रण में सुधार होगा, खासकर दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में जहां वाहन उत्सर्जन बड़ा योगदान देता है।
इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों पर भी असर पड़ेगा। WLTP में EV रेंज और हाइब्रिड फ्यूल एफिशिएंसी भी इसी साइकिल पर मापी जाएगी, जो ज्यादा रियलिस्टिक होगी। CAFE 2027-2032 नॉर्म्स में WLTP को शामिल करने की तैयारी चल रही है, जिससे EVs और हाइब्रिड्स को अतिरिक्त क्रेडिट मिल सकता है।
निर्माताओं को 2027 तक ट्रांजिशन पीरियड मिलेगा। नए मॉडल्स के लिए अप्रैल 2027 से अनिवार्य, जबकि पुराने मॉडल्स को भी बाद में अनुपालन करना होगा। यह बदलाव भारत की क्लीन मोबिलिटी और नेट-जीरो लक्ष्यों की दिशा में महत्वपूर्ण है।



