विजया एकादशी व्रत पारण: आज 14 फरवरी को खोलें व्रत, जानें सटीक समय, पूजा विधि और लाभ

“फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का व्रत 13 फरवरी को रखा गया। पारण 14 फरवरी सुबह 7:00 बजे से 9:14 बजे तक का शुभ मुहूर्त है। इस व्रत से शत्रु पर विजय, आर्थिक उन्नति और पापों से मुक्ति मिलती है।”

विजया एकादशी व्रत पारण: विधि, समय और महत्व

विजया एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित सबसे शक्तिशाली व्रतों में से एक है। यह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है और ‘विजय’ प्रदान करने वाली एकादशी के रूप में जानी जाती है। इस वर्ष 2026 में एकादशी तिथि 12 फरवरी दोपहर 12:22 बजे से शुरू होकर 13 फरवरी दोपहर 2:25 बजे तक रही। इसलिए व्रत 13 फरवरी (शुक्रवार) को रखा गया।

पारण का सटीक समय (नई दिल्ली के अनुसार) पारण द्वादशी तिथि पर सूर्योदय के बाद किया जाता है। इस बार पारण 14 फरवरी 2026 (शनिवार) को सुबह 7:00 बजे से 9:14 बजे तक रहेगा। द्वादशी तिथि दोपहर 4:01 बजे तक समाप्त हो रही है। पारण इसी अवधि में करना अनिवार्य है, अन्यथा व्रत का फल अधूरा रह सकता है। विभिन्न पंचांगों में मामूली अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग या ज्योतिषी से पुष्टि कर लें।

व्रत पारण की विधि

पारण सुबह उठकर स्नान करें।

भगवान विष्णु की पूजा करें या मंदिर जाएं।

पहले फल, मिठाई या दूध-चावल जैसे सात्विक भोजन से व्रत खोलें। अनाज पहले न लें।

पारण करते समय विष्णु मंत्रों का जाप करें।

पारण के बाद दान-पुण्य करें, जैसे गरीबों को भोजन या वस्त्र दें।

पूजा की पूरी विधि सुबह ब्रह्म मुहूर्त (लगभग 5:17 से 6:08 बजे) में उठें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें।

पूर्व या उत्तर दिशा में भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

दीपक जलाएं, अगरबत्ती लगाएं।

फल, फूल, तुलसी दल, चंदन, अक्षत चढ़ाएं।

भोग में खीर, पंचामृत, फल या सूखे मेवे लगाएं।

विष्णु सहस्रनाम या एकादशी व्रत कथा पढ़ें/सुनें।

आरती करें: ॐ जय जगदीश हरे… या विष्णु आरती।

अंत में प्रदक्षिणा और प्रणाम करें।

व्रत के नियम और क्या न करें

अनाज, चावल, गेहूं, दालें न खाएं। फलाहार, दूध, मखाना, साबूदाना, आलू, सिंघाड़ा का आटा इस्तेमाल करें।

तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा से दूर रहें।

क्रोध, झूठ, निंदा, चुगली से बचें।

ब्रह्मचर्य का पालन करें।

रात्रि जागरण करें और भजन-कीर्तन में समय बिताएं।

विजया एकादशी व्रत कथा पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से फाल्गुन कृष्ण एकादशी के बारे में पूछा। कृष्ण ने बताया कि प्राचीन काल में एक राजा थे जिनके पुत्र ने शत्रुओं से युद्ध में हार का सामना किया। राजकुमार ने विष्णु की कृपा से इस एकादशी का व्रत किया और विजय प्राप्त की। इसी से इसका नाम ‘विजया’ पड़ा। भगवान राम ने भी लंका विजय से पूर्व इस व्रत का प्रभाव महसूस किया था। व्रत करने से सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं और सफलता मिलती है।

लाभ और महत्व

शत्रुओं पर विजय और मुकदमों में सफलता।

आर्थिक संकट दूर होना और धन-समृद्धि।

पापों का नाश और मोक्ष प्राप्ति।

मनोकामनाएं पूर्ण होना।

स्वास्थ्य, सुख-शांति और पारिवारिक कलह समाप्ति।

यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो जीवन में संघर्ष, प्रतियोगिता या आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। नियमित एकादशी व्रत से विष्णु भक्ति बढ़ती है और जीवन में स्थिरता आती है।

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