“प्रेमानंद महाराज के अनुसार, आज के अधिकांश रिश्ते सच्चे प्रेम की बजाय व्यक्तिगत इच्छाओं, स्वार्थ और क्षणिक सुखों पर आधारित हैं। वे बताते हैं कि जहां स्वार्थ और शर्तें हैं, वहां सच्चा प्रेम नहीं टिक सकता। सच्चा प्रेम निस्वार्थ, आत्मिक जुड़ाव और दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढने से बनता है, जो आज के समय में दुर्लभ होता जा रहा है।”
प्रेमानंद महाराज का प्यार पर गहरा बयान
प्रेमानंद महाराज ने हाल के सत्संगों में आधुनिक रिश्तों की सच्चाई पर खुलकर बात की है। उनके शब्दों में आज का प्रेम अक्सर इच्छाओं का खेल बन जाता है। लोग रिश्ते में क्या मिलेगा, यह देखते हैं, न कि क्या दे सकते हैं। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि जहां स्वार्थ है, वहां प्रेम नहीं हो सकता। सच्चा प्रेम शर्तों से मुक्त होता है, केवल देना सिखाता है, लेना नहीं मांगता।
वे बताते हैं कि आजकल रिश्ते सुविधा और लाभ पर टिके रहते हैं। जैसे ही कोई बेहतर विकल्प दिखता है, रिश्ता टूट जाता है। यह इच्छाओं का बंधन है, प्रेम नहीं। महाराज जी का कहना है कि संसारिक प्रेम में ‘राग’ (आसक्ति) और ‘स्वार्थ’ प्रमुख होते हैं। व्यक्ति सामने वाले को अपनी खुशी का साधन बनाता है, न कि आत्मा का साथी। जब इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, तो झगड़े, अलगाव और दर्द शुरू हो जाता है।
सच्चे प्रेम की पहचान बताते हुए महाराज जी कहते हैं कि सच्चा प्रेम निस्वार्थ होता है। इसमें दूसरों की खुशी में अपनी खुशी मिलती है, भले ही वह खुशी आपको शामिल न करे। वे उदाहरण देते हैं कि यदि कोई आपके आंसुओं को देखकर भी नहीं पिघलता, तो वह प्रेम था ही नहीं। सच्चा प्रेम आत्मा से जुड़ता है, शरीर या सांसारिक आकर्षण से नहीं।
आज के युवाओं में बदलते रिश्तों पर महाराज जी चिंता जताते हैं। कई बार लोग कई रिलेशनशिप से गुजरते हैं, जिससे एक साथी के साथ स्थिर रहना मुश्किल हो जाता है। आदत विकल्पों की हो जाती है, संकल्प की नहीं। पहले विकल्प कम थे, लेकिन संकल्प मजबूत था। आज सौ विकल्प हैं, लेकिन संकल्प कमजोर है। यही कारण है कि रिश्ते टिक नहीं पाते।
महाराज जी रिश्तों को बचाने का मंत्र भी देते हैं। प्रेम को भगवान से जोड़ें। जब इंसान को भावनात्मक केंद्र बनाते हैं, तो डर लगता है कि कहीं खो न जाए। लेकिन जब भगवान केंद्र बनते हैं, तो न डर रहता है, न भीख मांगनी पड़ती है। प्रेम निस्वार्थ और बिना अपेक्षा के होना चाहिए। वे कहते हैं कि प्रेम में आत्मसम्मान पहले आता है। यदि रिश्ते में बार-बार खुद को छोटा करना पड़े, तो अकेलापन बेहतर है।
उनके विचारों में प्रेम को आध्यात्मिक स्तर पर देखा जाता है। सच्चा प्रेम वही है जो आत्मा को छूता है, जो दिव्य गुणों से जुड़ता है। जहां प्रेम भगवान से जोड़ता है, वही स्थायी होता है। संसारिक प्रेम में उतार-चढ़ाव आते हैं, लेकिन दिव्य प्रेम अटल रहता है।
महाराज जी युवाओं को सलाह देते हैं कि रिश्तों में अपेक्षाएं कम रखें। प्रेम को स्वार्थ से मुक्त करें। यदि रिश्ता मजबूरी या लाभ पर टिका है, तो वह टिकेगा नहीं। सच्चा प्रेम सम्मान, समझ और समर्पण से बनता है। वे बताते हैं कि जहां दोनों बराबरी से जुड़े हों, वहां प्रेम फलता-फूलता है।
आज के समय में यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रिश्तों में टूटन बढ़ रही है। लोग प्रेम की बजाय इच्छाओं को प्राथमिकता देते हैं, जिससे दुख बढ़ता है। महाराज जी का संदेश स्पष्ट है – इच्छाओं का बंधन तोड़कर सच्चे प्रेम की ओर बढ़ें, जो निस्वार्थ और आत्मिक हो।
Disclaimer: यह खबर सामान्य जानकारी और प्रचलित विचारों पर आधारित है।



