Cheti Chand 2026 Date: सिंधी नववर्ष कब से शुरू, नोट करें चेटीचंड की तारीख, मुहूर्त

“2026 में चेटीचंड 20 मार्च को मनाया जाएगा, जो सिंधी नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। मुहूर्त शाम 6:32 से 7:59 तक रहेगा, जिसमें झूलेलाल पूजा और जुलूस प्रमुख होंगे। सिंधी समुदाय इस दिन नई शुरुआत, समृद्धि और जल देवता की आराधना करता है, साथ ही पारंपरिक व्यंजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।”

चेटीचंड का महत्व चेटीचंड सिंधी हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है, जो चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा या द्वितीया तिथि पर मनाया जाता है। यह सिंधी नववर्ष की शुरुआत दर्शाता है और भगवान झूलेलाल के जन्मदिन के रूप में जाना जाता है। झूलेलाल को सिंधी समुदाय का इष्ट देव माना जाता है, जिन्होंने सिंध प्रांत में अत्याचारी शासक मीरखुश से समुदाय की रक्षा की। यह त्योहार जल तत्व की पूजा पर जोर देता है, क्योंकि झूलेलाल सिंधु नदी से अवतरित हुए थे। भारत में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में रहने वाले लाखों सिंधी परिवार इस दिन घरों में विशेष पूजा करते हैं, जो सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करता है। वैश्विक स्तर पर अमेरिका, ब्रिटेन और दुबई में सिंधी प्रवासी भी इसे उत्साह से मनाते हैं, जहां ऑनलाइन पूजा और वर्चुअल जुलूस आयोजित होते हैं।

2026 की तारीख और मुहूर्त 2026 में चेटीचंड 20 मार्च, शुक्रवार को मनाया जाएगा। यह तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वितीया पर आधारित है। मुहूर्त का समय शाम 6:32 बजे से 7:59 बजे तक रहेगा, जो पूजा और आरती के लिए सबसे शुभ माना जाता है। प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को रात 9:22 बजे से शुरू होकर 20 मार्च शाम 7:22 बजे तक चलेगी, जबकि द्वितीया तिथि 20 मार्च सुबह 4:54 बजे से शुरू होगी। क्षेत्रीय अंतर के कारण कुछ जगहों पर 19 मार्च को भी शुरुआती पूजा हो सकती है, लेकिन मुख्य उत्सव 20 मार्च को ही होगा।

समयविवरणमहत्व
शाम 6:32 से 7:59मुख्य मुहूर्तझूलेलाल आरती और प्रसाद वितरण के लिए आदर्श
सुबह 6:00 से 8:00प्रात:काल पूजाघरेलू रस्में जैसे बहराणा सजाना
रात 8:00 से 10:00जुलूस समयसिंधी मंदिरों में सामूहिक उत्सव

पूजा विधि और रस्में पूजा की शुरुआत घर को साफ-सुथरा करके होती है, जहां झूलेलाल की मूर्ति या तस्वीर को झूले पर सजाया जाता है। बहराणा नामक थाली में चावल, इलायची, फल, मेवे और एक मछली की आकृति रखी जाती है, जो जल देवता का प्रतीक है। आरती के दौरान “झूलेलाल जो धमाल” जैसे भजन गाए जाते हैं। सिंधी परिवार नदी या जल स्रोत पर जाकर जल में फूल और प्रसाद अर्पित करते हैं। महिलाएं पारंपरिक साड़ी और पुरुष कुर्ता-पायजामा पहनते हैं। कुछ परिवार 40 दिनों की चालीहा व्रत रखते हैं, जो चेटीचंड पर समाप्त होता है। आधुनिक समय में, युवा सिंधी समुदाय सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए पूजा साझा करते हैं, जिससे वैश्विक जुड़ाव बढ़ता है।

सांस्कृतिक और सामाजिक पहलू चेटीचंड सिंधी संस्कृति का जीवंत प्रदर्शन है, जहां नृत्य, संगीत और नाटक आयोजित होते हैं। उल्हासनगर, अजमेर और इंदौर जैसे शहरों में बड़े जुलूस निकलते हैं, जिसमें झूलेलाल की झांकी को नदी तक ले जाया जाता है। यह त्योहार पर्यावरण जागरूकता भी फैलाता है, क्योंकि जल पूजा के माध्यम से नदियों की सफाई पर जोर दिया जाता है। हाल के वर्षों में, सिंधी संगठन जल संरक्षण अभियान चलाते हैं, जैसे सिंधु नदी की सफाई ड्राइव। आर्थिक रूप से, यह बाजारों में मिठाई, पूजा सामग्री और पारंपरिक वस्त्रों की बिक्री बढ़ाता है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है।

पारंपरिक व्यंजन चेटीचंड पर सिंधी रसोई में विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। मुख्य रूप से शाकाहारी भोजन पर जोर रहता है, जैसे सई भाजी (पालक और दाल की सब्जी), सिंधी करी (बेसन और सब्जियों की ग्रेवी), और ताहिरी (मीठे चावल)। प्रसाद में अक्का (गेहूं का हलवा) और फल शामिल होते हैं। कुछ परिवार मछली आकार की मिठाई बनाते हैं, जो झूलेलाल के जल अवतार को दर्शाती है। स्वास्थ्य के लिहाज से, ये व्यंजन पौष्टिक होते हैं, जिसमें दालें और सब्जियां प्रमुख हैं।

क्षेत्रीय विविधताएं भारत में गुजरात और राजस्थान में चेटीचंड को छुट्टी घोषित किया जाता है, जहां सिंधी बहुल इलाकों में स्कूल और कार्यालय बंद रहते हैं। महाराष्ट्र के उल्हासनगर में यह सबसे बड़ा उत्सव है, जहां हजारों लोग जुलूस में शामिल होते हैं। विदेशों में, अमेरिका के न्यू जर्सी और कैलिफोर्निया में सिंधी एसोसिएशन बड़े हॉल में कार्यक्रम आयोजित करते हैं। महामारी के बाद, हाइब्रिड मोड में उत्सव बढ़े हैं, जहां ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे Zoom पर पूजा होती है।

झूलेलाल की कथा झूलेलाल की कथा 10वीं शताब्दी की है, जब सिंध में मीरखुश नामक शासक ने हिंदुओं पर अत्याचार किया। सिंधी लोगों ने सिंधु नदी पर 40 दिनों तक प्रार्थना की, जिसके बाद झूलेलाल एक बच्चे के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने शासक को हराया और समुदाय की रक्षा की। यह कथा सहिष्णुता और एकता का संदेश देती है, जो आज भी प्रासंगिक है।

समाज में प्रभाव चेटीचंड सिंधी पहचान को बनाए रखने में मदद करता है, खासकर विभाजन के बाद भारत आए सिंधियों के लिए। यह युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ता है, जहां स्कूलों में विशेष कार्यक्रम आयोजित होते हैं। पर्यटन के लिहाज से, सिंधी मंदिर जैसे झूलेलाल मंदिर (उल्हासनगर) में आगंतुक बढ़ते हैं।

Disclaimer: यह लेख समाचार, रिपोर्ट और सुझावों पर आधारित है। स्रोतों की सटीकता की गारंटी नहीं है।

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