“हिंदू विवाह संस्कार में दुल्हन विदाई के समय मायके में पीछे की ओर चावल फेंकती है, जबकि ससुराल में गृहप्रवेश पर आगे की ओर चावल गिराती है। यह प्रथा लक्ष्मी स्वरूपा बेटी द्वारा दोनों कुलों में समृद्धि, आशीर्वाद और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है – मायके को अंतिम कृपा देकर और ससुराल में धन-धान्य की वर्षा कर।”
हिंदू विवाह परंपरा में चावल (अक्षत) का विशेष स्थान है। यह केवल अनाज नहीं, बल्कि समृद्धि, उर्वरता और लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। दुल्हन के जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण क्षणों – विदाई और गृहप्रवेश – में चावल फेंकने की रस्म अलग-अलग दिशाओं में निभाई जाती है, जिसका गहरा शास्त्रीय और भावनात्मक आधार है।
विदाई के समय मायके में पीछे की ओर चावल फेंकना
जब दुल्हन मायके से विदा होती है, तो वह अपने सिर के ऊपर से दोनों हाथों में अक्षत लेकर पीछे की ओर फेंकती है। यह रस्म सामान्यतः 5 बार दोहराई जाती है और दुल्हन को पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। परिवार की महिलाएं आंचल फैलाकर इन चावलों को इकट्ठा करती हैं, ताकि कोई दाना भी जमीन न गिरे।
इस रस्म का मुख्य महत्व यह है कि बेटी को हिंदू शास्त्रों में लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। वह मायके में रहकर परिवार को धन, सुख और सुरक्षा प्रदान करती है। विदाई के समय पीछे चावल फेंककर वह अपने मायके को अंतिम आशीर्वाद देती है – यह प्रतीक है कि वह घर की समृद्धि अपने साथ नहीं ले जा रही, बल्कि उसे पीछे छोड़कर जा रही है। इससे मायके में हमेशा धन-धान्य और शुभता बनी रहेगी।
यह क्रिया कन्या के द्वारा माता-पिता को उनके पालन-पोषण के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम भी है। चावल फेंककर वह कहती है कि बचपन से मिले प्यार, भोजन और सुरक्षा का बदला वह समृद्धि के रूप में लौटा रही है। साथ ही, पीछे न देखना दर्शाता है कि अब वह अतीत से मुक्त होकर नए जीवन की ओर पूरी तरह अग्रसर है। कोई लगाव या ऋण पीछे नहीं छोड़ रही।
गृहप्रवेश पर ससुराल में आगे की ओर चावल गिराना
ससुराल पहुंचने पर गृहप्रवेश की रस्म में दुल्हन के सामने चावल से भरा कलश रखा जाता है। वह दाएं पैर से कलश को ठोकर मारकर अंदर प्रवेश करती है, जिससे चावल आगे की ओर बिखर जाते हैं। यह क्रिया लक्ष्मी के घर में प्रवेश का प्रतीक है।
शास्त्रों के अनुसार, नई बहू घर में लक्ष्मी रूप में आती है। कलश को पैर से गिराकर चावल का बिखराव दर्शाता है कि उसके आने से घर में धन, अन्न, सुख और समृद्धि की वर्षा होगी। आगे की दिशा में चावल गिरना भविष्य की ओर सकारात्मक ऊर्जा और वैभव का संकेत है। यह रस्म परिवार को आश्वस्त करती है कि नई सदस्य के रूप में लक्ष्मी स्वयं घर में विराजमान हो रही है।
कुछ परंपराओं में दुल्हन हाथ से भी थोड़े चावल आगे फेंकती है, जो उर्वरता और नए जीवन की शुरुआत को मजबूत बनाता है। यह क्रिया ससुराल वालों को बताती है कि बहू केवल बोझ नहीं, बल्कि धन-धान्य लाने वाली है।
दोनों रस्मों का तुलनात्मक महत्व
दिशा का प्रतीक : पीछे फेंकना – अतीत को आशीर्वाद देकर छोड़ना; आगे गिराना – भविष्य में समृद्धि लाना।
लक्ष्मी का द्वैत : मायके की लक्ष्मी विदा होकर ससुराल की लक्ष्मी बनती है, दोनों कुलों को कृपा प्रदान करती है।
भावनात्मक संतुलन : विदाई में पीछे फेंकना भावुक विदाई को शुभ बनाता है, जबकि गृहप्रवेश में आगे गिराना नए घर में उत्साह और स्वागत का माहौल बनाता है।
शास्त्रीय आधार : वेदों और पुराणों में अक्षत को अक्षय सुख का प्रतीक माना गया है। यह रस्में 16 संस्कारों में विवाह के अंतर्गत आती हैं, जहां कन्या के परिवर्तन को दिव्य बनाया जाता है।
कुंजी बिंदु
चावल = लक्ष्मी, अन्न, समृद्धि का प्रतीक
पीछे फेंकना = मायके को आशीर्वाद और कृतज्ञता
आगे गिराना = ससुराल में धन-धान्य की वर्षा
पीछे न देखना = अतीत से पूर्ण मुक्ति
कलश ठोकर = लक्ष्मी का घर में प्रवेश
यह प्रथा भारतीय संस्कृति की गहराई दर्शाती है, जहां हर रस्म भावनाओं, आस्था और जीवन दर्शन से जुड़ी होती है।
Disclaimer: यह लेख धार्मिक परंपराओं और शास्त्रीय मान्यताओं पर आधारित है। इसे आस्था और सांस्कृतिक महत्व के संदर्भ में समझें।



