“होली 2026 में भारत की ये 6 अनोखी जगहें रंगों से ज्यादा परंपराओं से चर्चा में रहेंगी—मुर्दे की सवारी से लेकर कोड़े और पत्थरों तक, जहां त्योहार की अलग ही तस्वीर उभरती है।”
भारत में होली का त्योहार हर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखता है। जहां बरसाना-नंदगांव में लट्ठमार होली मशहूर है, वहीं कुछ जगहों पर परंपराएं इतनी अनोखी हैं कि वे रंगों से ज्यादा अपनी विचित्रता के लिए जानी जाती हैं। होली 2026 में ये 6 जगहें अपनी खास परंपराओं से सुर्खियां बटोर रही हैं।
भीलवाड़ा (राजस्थान) – मुर्दे की सवारी वाली होली भीलवाड़ा में शीतला सप्तमी पर होली की शुरुआत मुर्दे की सवारी से होती है। यहां लोग शवयात्रा की तरह जुलूस निकालते हैं, लेकिन इसमें रंग और गुलाल का जमकर इस्तेमाल होता है। जुलूस में शामिल लोग नाचते-गाते आगे बढ़ते हैं और एक-दूसरे पर रंग डालते हैं। यह परंपरा मृत्यु और जीवन के चक्र को दर्शाती है, जहां होली को खुशी के साथ मनाया जाता है। जीनगर समुदाय इस उत्सव को खास तौर पर अपनाता है और शहर के मुख्य बाजारों में यह जुलूस निकलता है।
भीलवाड़ा और आसपास (राजस्थान) – कोड़ामार होली भीलवाड़ा के सराफा बाजार और जीनगर समुदाय में कोड़ामार होली खेली जाती है। महिलाएं पुरुषों पर कोड़े (चाबुक) मारती हैं, जबकि पुरुष खुद को बचाने की कोशिश करते हैं। यह परंपरा 200 साल से ज्यादा पुरानी है और तेरस के दिन मनाई जाती है। महिलाओं का यह खेल प्रतीकात्मक रूप से रक्षा और प्रेम का संदेश देता है। पुरुष बिना विरोध किए कोड़े सहते हैं और फिर रंगों से होली मनाते हैं। यह उत्सव समाज में महिलाओं की मजबूती को भी दिखाता है।
बांसवाड़ा और भीलुडा (राजस्थान) – पत्थरबाजी वाली होली बांसवाड़ा जिले के जनजातीय इलाकों में होली पर पत्थरबाजी की अनोखी परंपरा है। होलिका दहन की राख पर चलने के बाद लोग एक-दूसरे पर छोटे-छोटे पत्थर फेंकते हैं। यह खेल धुलंडी के दिन होता है और इसमें घायल होने का खतरा रहता है, इसलिए सावधानी बरती जाती है। मान्यता है कि इससे बुरी शक्तियां दूर होती हैं। भीलुडा गांव में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है, जहां रंगों के साथ पत्थर भी होली का हिस्सा बन जाते हैं।
बरसाना और नंदगांव (उत्तर प्रदेश) – लट्ठमार होली बरसाना में महिलाएं लाठियों से पुरुषों पर हमला करती हैं, जो नंदगांव से आते हैं। यह कृष्ण-राधा की लीला पर आधारित है, जहां राधा की सखियां कृष्ण के छेड़ने का बदला लेती हैं। पुरुष ढाल लेकर बचाव करते हैं। नंदगांव में अगले दिन पुरुषों का पलटवार होता है। 2026 में बरसाना लट्ठमार 25-26 फरवरी के आसपास और नंदगांव 27 फरवरी को प्रमुख रहेगी। लाखों पर्यटक इस जीवंत दृश्य को देखने पहुंचते हैं।
दाऊजी मंदिर, बालदेव (उत्तर प्रदेश) – हुरंगा होली दाऊजी मंदिर में हुरंगा होली सबसे उग्र रूप में खेली जाती है। महिलाएं पुरुषों के कपड़े फाड़ती हैं और रंगों से पूरी तरह भिगो देती हैं। यह परंपरा बलदेव (दाऊजी) में कृष्ण के बड़े भाई बलराम से जुड़ी है। पुरुष बिना विरोध के यह सब सहते हैं। यह होली रंगों, पानी और उन्माद से भरी होती है, जहां हजारों लोग शामिल होते हैं। 2026 में यह मुख्य होली के बाद मनाई जाएगी।
श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ (राजस्थान-पंजाब बॉर्डर) – कोड़ामार होली पंजाब से सटे इन इलाकों में देवर-भाभी या महिलाओं द्वारा पुरुषों पर कोड़ा मारने की परंपरा है। महिलाएं कोड़े से हल्के प्रहार करती हैं और फिर रंग खेलती हैं। यह खेल परिवारिक रिश्तों में मजाक और प्रेम का प्रतीक है। यहां होली पारंपरिक रंगों के साथ इस अनोखे खेल से पूरी होती है।
ये परंपराएं भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं, जहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि स्थानीय मान्यताओं और इतिहास का जीवंत रूप है। होली 2026 में इन जगहों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम रहेंगे, ताकि उत्सव सुरक्षित और आनंददायक बने।
Disclaimer: यह लेख सामान्य जानकारी और प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। स्थानीय नियमों का पालन करें और उत्सव के दौरान सावधानी बरतें।



