“वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर दशकों पुरानी ‘मसान की होली’ इस बार विवादों में घिर गई है। डोम राजा परिवार के वंशज विश्वनाथ चौधरी ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर आयोजन पर रोक लगाने की मांग की है और चेतावनी दी है कि यदि परंपरा नहीं रोकी गई तो महाश्मशान में दाह संस्कार रोक दिए जाएंगे। काशी विद्वत परिषद सहित अन्य संगठनों के विरोध के बीच यह मुद्दा धार्मिक संवेदनशीलता और परंपरा की गरिमा पर केंद्रित हो गया है।”
वाराणसी के मणिकर्णिका घाट, जिसे महाश्मशान के रूप में जाना जाता है, पर फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को मनाई जाने वाली ‘मसान की होली’ इस वर्ष गंभीर विवाद का विषय बन गई है। यह परंपरा दशकों से चली आ रही है, जिसमें चिताओं की भस्म से होली खेली जाती है और इसे भगवान शिव के गणों तथा बाबा विश्वनाथ की उपस्थिति से जोड़ा जाता है। लेकिन अब डोम राजा परिवार, जो सदियों से इस महाश्मशान की अग्नि और दाह संस्कार की व्यवस्था संभालता आया है, ने इस आयोजन का खुलकर विरोध किया है।
डोम राजा परिवार के प्रमुख वंशज विश्वनाथ चौधरी ने जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस कमिश्नर को ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने मांग की है कि मणिकर्णिका घाट पर इस आयोजन को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए। उनका कहना है कि चिता की राख से होली खेलना शास्त्रसम्मत नहीं है और इससे महाश्मशान की पवित्रता तथा गरिमा को गहरा आघात पहुंच रहा है। डोम समुदाय का दावा है कि यह परंपरा किसी पुराण या शास्त्र में वर्णित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समय में फैलाई गई अराजकता का रूप ले चुकी है।
विश्वनाथ चौधरी ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन इस आयोजन पर रोक नहीं लगाता तो वे मजबूर होकर महाश्मशान में दाह संस्कार की प्रक्रिया रोकने को बाध्य होंगे। यह कदम इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि मणिकर्णिका घाट पर 24 घंटे दाह संस्कार चलते रहते हैं और यहां रोजाना सैकड़ों अंतिम संस्कार होते हैं। डोम राजा परिवार की यह भूमिका ऐतिहासिक है, जहां वे अग्नि प्रदान करने और चिता व्यवस्था संभालने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
इस विवाद में काशी विद्वत परिषद भी डोम राजा परिवार के साथ खड़ी है। परिषद के सदस्यों का कहना है कि मसान की होली महाश्मशान की आध्यात्मिक गरिमा के विपरीत है। यहां जहां मृत्यु का चक्र चलता है, वहां रंग-रेलियों और हुड़दंग की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। कई संत समितियां और विद्वान भी इसे अशास्त्रीय बता रहे हैं। उनका तर्क है कि शिव की तपोभूमि और अघोरी साधकों का स्थान होने के नाते मणिकर्णिका को शोर-शराबे से दूर रखना चाहिए।
दूसरी ओर, आयोजकों और कुछ स्थानीय भक्तों का पक्ष है कि यह सदियों पुरानी परंपरा है। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के बाद फाल्गुन द्वादशी को भगवान शिव स्वयं मणिकर्णिका घाट पर स्नान करने आते हैं और उनके गण भस्म से होली खेलते हैं। इस दौरान मसाननाथ मंदिर से शुरू होकर घाट पर भस्म लगाकर होली मनाई जाती है। कुछ का कहना है कि यह जीवन-मृत्यु के चक्र का प्रतीक है और इससे मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
प्रशासन इस मुद्दे पर सतर्क है। जिला प्रशासन को ज्ञापन मिलने के बाद जांच शुरू हो गई है। यदि आयोजन की अनुमति नहीं दी गई तो 28 फरवरी को होने वाला कार्यक्रम प्रभावित हो सकता है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि इस विवाद से धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं और कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
यह विवाद काशी की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं की जटिलता को उजागर करता है, जहां प्राचीन मान्यताएं और आधुनिक संवेदनशीलता आमने-सामने हैं। डोम राजा परिवार की चेतावनी ने इस मुद्दे को नया आयाम दिया है, क्योंकि दाह संस्कार रोकना महाश्मशान की निरंतरता पर सीधा प्रभाव डालेगा।
Disclaimer: यह खबर उपलब्ध जानकारी और वर्तमान घटनाक्रम पर आधारित है। इसमें व्यक्तिगत राय शामिल नहीं है।



