क्या होती है भारत की ‘संचित निधि’, इसे क्यों कहते हैं सरकार का खजाना? बिना इजाजत के PM भी नहीं निकाल सकते पैसा.

“भारत की संचित निधि संविधान के अनुच्छेद 266(1) के तहत स्थापित मुख्य सरकारी कोष है, जिसमें सभी कर राजस्व, ऋण और अन्य प्राप्तियां जमा होती हैं। इसे सरकार का खजाना इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह केंद्र सरकार के सभी व्ययों का आधार है, लेकिन संसद की मंजूरी के बिना कोई भी राशि निकाली नहीं जा सकती, यहां तक कि प्रधानमंत्री भी नहीं। 2025-26 के बजट में इससे 50.65 लाख करोड़ रुपये के व्यय की अनुमति दी गई है, जिसमें रक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर फोकस है।”

भारत की संचित निधि केंद्र सरकार की वित्तीय प्रणाली का मूल आधार है, जो सभी राजस्व संग्रह और व्यय प्रबंधन को नियंत्रित करती है। यह संविधान के अनुच्छेद 266(1) के अनुसार स्थापित की गई है, जिसमें सरकार द्वारा एकत्रित सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर, जैसे आयकर, जीएसटी, सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क, साथ ही बाजार से उधार ली गई राशि और दिए गए ऋणों की वापसी शामिल होती है। 2025-26 के बजट में इस निधि से कुल 50.65 लाख करोड़ रुपये के व्यय का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 7.4% अधिक है। यह निधि इसलिए सरकार का ‘खजाना’ कहलाती है क्योंकि यह राष्ट्रीय विकास, रक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों के लिए धन का मुख्य स्रोत है, लेकिन इसका उपयोग सख्त संवैधानिक नियमों से बंधा है।

संचित निधि में जमा होने वाली प्रमुख प्राप्तियां इस प्रकार हैं: कर राजस्व से 28.37 लाख करोड़ रुपये का अनुमान, जिसमें जीएसटी और आयकर का बड़ा हिस्सा है; गैर-कर राजस्व से अतिरिक्त धनराशि; और उधार से प्राप्त राशि, जो राजकोषीय घाटे को कवर करती है। 2025-26 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.4% अनुमानित है, जो वित्तीय अनुशासन को दर्शाता है। इस निधि से व्यय दो श्रेणियों में विभाजित होता है: मतदान योग्य व्यय, जो संसद द्वारा बहस के बाद मंजूर होता है, और संचित निधि पर भारित व्यय, जो बिना बहस के स्वत: मंजूर होता है। उदाहरण के लिए, राष्ट्रपति का वेतन, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन और चुनाव आयोग के खर्च इस श्रेणी में आते हैं।

इस निधि से धन निकालने की प्रक्रिया पूरी तरह संसद पर निर्भर है। वित्त मंत्री बजट में अनुदान मांगों के रूप में व्यय प्रस्ताव रखते हैं, जिन्हें लोकसभा में मतदान के बाद विनियोग विधेयक के माध्यम से मंजूरी मिलती है। बिना संसद की पूर्व अनुमति के कोई भी राशि नहीं निकाली जा सकती, यहां तक कि आपात स्थिति में भी नहीं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री या कोई भी कार्यकारी अधिकारी स्वतंत्र रूप से इसका उपयोग नहीं कर सकता। 2025 में सोलहवें वित्त आयोग ने 2026-31 के लिए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें संचित निधि के माध्यम से राज्यों को अनुदान वितरण की सिफारिशें शामिल हैं, जो केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों को मजबूत करती हैं।

संचित निधि के प्रमुख घटक और उनकी भूमिका

संचित निधि को तीन मुख्य भागों में समझा जा सकता है:

राजस्व प्राप्तियां : इसमें कर और गैर-कर स्रोत शामिल हैं। 2025-26 में कुल प्राप्तियां (उधार को छोड़कर) 34.96 लाख करोड़ रुपये अनुमानित हैं, जिसमें जीएसटी से बढ़ती हुई आमदनी का योगदान है।

पूंजी प्राप्तियां : उधार और ऋण वापसी से आने वाली राशि, जो बुनियादी ढांचे के लिए उपयोग होती है। हाल के वर्षों में कैपेक्स पर फोकस बढ़ा है, जैसे 2025-26 में 11.11 लाख करोड़ रुपये का आवंटन।

व्यय प्रबंधन : निधि से निकासी केवल विनियोग विधेयक के बाद संभव है। अनुपूरक अनुदान से अतिरिक्त व्यय की अनुमति मिलती है, लेकिन यह भी संसद की मंजूरी पर निर्भर है।

2025-26 बजट में संचित निधि से प्रमुख आवंटन

नीचे दी गई तालिका 2025-26 के बजट में संचित निधि से विभिन्न मंत्रालयों को दिए गए प्रमुख आवंटनों को दर्शाती है (रुपये में लाख करोड़):

मंत्रालय/विभागराजस्व व्ययपूंजी व्ययकुल आवंटन
रक्षा मंत्रालय4.891.926.81
शिक्षा मंत्रालय1.290.00011.29
कृषि एवं किसान कल्याण1.380.00091.38
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण0.900.0010.90
ग्रामीण विकास1.800.00051.80
वित्त मंत्रालय (आर्थिक मामले)17.172.2219.39

ये आवंटन दर्शाते हैं कि संचित निधि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं जैसे रक्षा (जिसमें 1.80 लाख करोड़ कैपिटल आउटले पर खर्च), शिक्षा (स्कूल और उच्च शिक्षा पर फोकस) और कृषि (किसान कल्याण योजनाओं के लिए) को कैसे समर्थन देती है। 2025 में वित्त मंत्रालय ने आईएफएससी में एफपीआई निवेश को आसान बनाने के लिए नियमों में संशोधन किया, जो संचित निधि में विदेशी पूंजी की आमद बढ़ाएगा।

संचित निधि पर भारित व्यय के उदाहरण

संचित निधि पर कुछ व्यय ऐसे हैं जो संसद की बहस के बिना स्वत: निकाले जाते हैं। ये संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं:

राष्ट्रपति का वेतन और भत्ते: लगभग 10 करोड़ रुपये वार्षिक।

लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति के वेतन: कुल 5 करोड़ रुपये।

सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन: 1,000 करोड़ रुपये से अधिक।

चुनाव आयोग का व्यय: 500 करोड़ रुपये।

ऋण ब्याज भुगतान: 2025-26 में 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक, जो निधि का बड़ा हिस्सा है।

ये व्यय कुल बजट का 25-30% हिस्सा लेते हैं और वित्तीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं।

संचित निधि की तुलना अन्य निधियों से

भारत में तीन मुख्य निधियां हैं: संचित निधि, आकस्मिकता निधि और लोक लेखा। आकस्मिकता निधि (अनुच्छेद 267) आपात व्यय के लिए है, जो राष्ट्रपति के नियंत्रण में है और बाद में संसद से मंजूरी ली जाती है। लोक लेखा (अनुच्छेद 266(2)) में भविष्य निधि जैसे कर्मचारी योगदान जमा होते हैं, जो कार्यपालिका के अधीन है। संचित निधि इनमें सबसे बड़ी है, क्योंकि यह सभी मुख्य राजस्व को कवर करती है और संसद की सीधी निगरानी में है। 2025 में शहरी चुनौती कोष की स्थापना से संचित निधि के माध्यम से 1 लाख करोड़ रुपये का आवंटन शहरों के विकास के लिए किया गया, जो इसकी बहुमुखी भूमिका को दर्शाता है।

संचित निधि में हाल के सुधार और चुनौतियां

हाल के वर्षों में डिजिटल ट्रांजेक्शन से राजस्व संग्रह बढ़ा है, जैसे यूपीआई से जुड़े कर भुगतान। 2025 में वित्त आयोग की सिफारिशों से राज्यों को संचित निधि से अधिक अनुदान मिल सकता है, जो संघीय ढांचे को मजबूत करेगा। हालांकि, चुनौतियां जैसे बढ़ता राजकोषीय घाटा (4.4%) और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं निधि के प्रबंधन को प्रभावित करती हैं। सरकार ने डिसइन्वेस्टमेंट से राजस्व बढ़ाने पर फोकस किया, जिससे पीएसयू से डिविडेंड संचित निधि में जमा होता है।

संचित निधि का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

यह निधि आर्थिक विकास को गति देती है, जैसे 2025-26 में कैपेक्स पर 11.11 लाख करोड़ रुपये से बुनियादी ढांचे का विकास। इससे रोजगार सृजन होता है और जीडीपी ग्रोथ को सपोर्ट मिलता है। साथ ही, सामाजिक योजनाओं जैसे पीएम किसान और आयुष्मान भारत के लिए धन इसी से आता है। 2025 में बजट ने मध्यम वर्ग के लिए टैक्स राहत दी, जो संचित निधि में कर राजस्व बढ़ाने में मदद करेगी।

Disclaimer: यह समाचार, रिपोर्ट और टिप्स सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित हैं।

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